मंदिर से अज़ान
आज़ फ़िर एक धमाका, अबकी मज्जिद मे.
एक महिने के भीतर,
कभी मंदिर और कभी मज्जिद,
मगर मरेंगे तो पहले इंसान,
फ़िर ही तो होंगे वो हिंदू या मुसलमान:
मंदिर से अज़ान
अमन की चाह मे
दुनिया नई बना दी जाये
रामायण और कुरान छोड के
इन्सानियत आज पढा दी जाये.
जहां मे रोशनी करता
चिरांगा आसमां का है
सरहद को बांटती रेखा
क्यूँ ना आज मिटा दी जाये.
रिश्तों मे दरार डालती
सियासी ये किताबें हैं
ईद के इस मौके पे इनकी
होली आज जला दी जाये.
आपस मे बैर रखना
धर्म नही सिखाता है
मंदिर के कमरे से ‘समीर’
अज़ान आज लगा दी जाये.
–समीर लाल ‘समीर’
सागर चन्द नाहर said,
April 14, 2006 at 9:01 am
बहुत अच्छी कवितायें है, परन्तु हम सब जानते हैं कि कुत्ते कि दुम कभी सीधी नहीं होती उसी तरह मंदिरों और मस्जिदों में धमाका करने वाले कभी सुधर नहीं सकते, ये कल्पना करना भी मुश्किल प्रतीत होता है कि “मंदिर के कमरे से अजान या मस्जिद में आरती गाई जाये. काश आपकी आशा सफ़ल हो और इन्सानियत फ़िर से जिन्दा हो.
उडन तश्तरी said,
April 14, 2006 at 9:15 am
सागर जी
अब सोच जागी है तो कभी उसके पूरा होने की उम्मीद भी है.
धन्यवाद
समीर
Ramlal said,
April 14, 2006 at 12:49 pm
अति सुन्दर ।
उडन तश्तरी said,
April 14, 2006 at 12:51 pm
धन्यवाद, राम जी.
Pankaj Bengani said,
April 14, 2006 at 9:04 pm
आप बहुत अच्छी कविता करते हैं.
- मास्साब
उडन तश्तरी said,
April 14, 2006 at 9:09 pm
मास्साब ने जब पास कर दिया, तब तो हम ग्रेजुयेट हो गये.
बहुत धन्यवाद
समीर लाल
शैलेश भारतवासी said,
April 15, 2006 at 3:15 am
जहां मे रोशनी करता
चिरांगा आसमां का है
सरहद को बांटती रेखा
क्यूँ ना आज मिटा दी जाये.
समीर जी क्या लिखा हैं|||
आप ऐसे ही कलम चलाते रहिये, कभी तो इन नासमझों को
समझ आयेगी। काश कि बिस्फोट करने से पहले ये साम्प्रादायिक लोग
आपकी कविता पढ़े होते, मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन घटनाओं की
नौवत ना आती।
उडन तश्तरी said,
April 15, 2006 at 7:54 am
शैलेश भाई
विचारों की अभिव्यक्ति कर एक प्रयास मात्र है कि शायद कोई अलख कहीं कुछ रास्ता दिखाये.
धन्यवाद आपका कि आपको कुछ आशा की किरण की उम्मीद है, रचना सफ़ल हुई.
समीर लाल
महावीर said,
April 16, 2006 at 2:11 pm
आप जैसे कवि और लेखक यदि इस प्रकार की वचारधारा को बनाए रखेंगे तो एक दिन लोग
प्रेरित होकर एक ऐसी इमारत बनाएंगे जिससे अज़ान की रुहानी आवाज़, आर्तों की दुख-हारिणी आरती और बाईबल के दस कमांडमेंट्स की ध्वनि गूञ्जती हुई लोगों के ह्रदयों तक पहुंच कर मस्तिष्क को सोचने में मजबूर कर देगी कि यह नफ़रत की आग व्यर्थ के फ़ितूर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
बहुत सुंदर रचना है।
महावीर शर्मा
उडन तश्तरी said,
April 16, 2006 at 7:47 pm
सही कह रहे हैं आप, महावीर जी.
रचना पसंद करने के लिये आभारी हूँ आपका.
समीर लाल