अनुगूँज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व: अपना धर्म चलायें
यह अनुगूँज मे मेरा पहला प्रयास है, वो भी कुण्डली के माध्यम से, एकदम नया तरीका: ![]()

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर
पाछे पाछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर
कहत कबीर कबीर कि भईये ये कैसा जंतर
धर्म बना सिर्फ़ नाम और साधू सब बंदर
कह समीर टीवी पर हम खेलें रंग अबीर
अपना धर्म चलायें किनारे खडे रहें कबीर.
–समीर लाल ‘समीर’
अनूप शुक्ला said,
अप्रैल 12, 2006 at 12:38 पूर्वाह्न
बढ़िया धर्म है। खूब चलेगा।पेटेंट करवा लीजिये।
उडन तश्तरी said,
अप्रैल 12, 2006 at 2:33 पूर्वाह्न
धन्यवाद, अनूप भाई.पेटेंट की कार्यवाही जारी है.
सागर चन्द नाहर said,
अप्रैल 12, 2006 at 2:59 पूर्वाह्न
भाई साहब,
बस इतनी ही?… मन भी नहीं भरा इतनी सी कुण्डलियों से, हमारा क्या होगा…………?
उडन तश्तरी said,
अप्रैल 12, 2006 at 3:02 पूर्वाह्न
सागर भाई
फ़िर झेल लिजियेगा.
प्रयास करुंगा इसे थोडा और बढाने का.
धन्यवाद
समीर
महावीर said,
अप्रैल 13, 2006 at 4:51 पूर्वाह्न
समीर भाई,
पढ़ कर आनंद आगया !
” भावों और सब्दों का जादू, जानत लाल ‘समीर’
‘उड़न तस्तरी’ देख देख कर, खुस होवै ‘महावीर !”
महावीर शर्मा
उडन तश्तरी said,
अप्रैल 13, 2006 at 4:59 पूर्वाह्न
महावीर जी
बहुत धन्यवाद, आप पधारे और आपको मेरी रचना पसंद आयी.काव्यात्मक तारीफ़ के शब्द खुबसूरत हैं.
समीर लाल
renu ahuja said,
अप्रैल 13, 2006 at 12:30 अपराह्न
कुंड़ली लगा कर बैठ गये देखो कवि समीर,
विचारों के उड़ रहे, बहुत गुलाल अबीर,
बहुत गुलाल अबीर,नया ये धर्म चला है,
गोरख धंधा टी वी पर ये चलन भला है,
बातें धर्म की बहुत पर, नाहीं सुध है उसकी
नया है ज्योतिष भईया और है, नई कुंड़ली.
समीर जी, आप किस चक्कर में पड़ने की सोच रहे है, धर्म तो आप पहले ही निभा रहे है—: ‘कवि धर्म’-…श्रीमति रेणु आहूजा.
उडन तश्तरी said,
अप्रैल 13, 2006 at 12:54 अपराह्न
वाह रेणु जी
बहुत बढिया लिखा है और सलाह भी नेक है. पुनः विचार करता हूँ.
धन्यवाद
समीर लाल