खुदा बनाया है…
खामोशी की इस ज़ुबां मे तूने
आज ये कैसा गीत सुनाया है.
अब दर्द का लावा आँसू बनकर
क्यूँ दिल मे जा समाया है.
हर साँस मे जो रहता था कल
अब पास ना उसका साया है.
कितने गहरे ज़ख्म लगे हैं
मरहम ना अब तक पाया है.
फ़िर क्यूँ जिससे ठोकर खाई
अब उसको ही खुदा बताया है.
जब जब भी यादों मे आया
तब तुमने शीश नवाया है.
–समीर लाल ‘समीर’
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महाकवि Robert Frost भाग ३: एक नज़रिया-क्षणभंगुर बचपन
जैसा कि मैने पहिले भी कहा था कि Robert Frost हमेशा से मेरे अंग्रेजी के सबसे पसंदीदा कवि रहे है.आज़ फिर एक कविता जो कब से डायरी मे थी, पर नज़र पड गई और भईया को पढते पढते हिन्दी जोर मारने लगी. मात्र मेरे विचार हैं, देखें:
Nothing Gold Can Stay
Nature’s first green is gold,
Her hardest hue to hold.
Her early leaf’s a flower;
But only so an hour.
Then leaf subsides to leaf.
So Eden sank to grief,
So dawn goes down to day.
Nothing gold can stay.
–Robert Frost
मेरा नज़रिया: क्षणभंगुर बचपन
इस चमन मे एक बालक
फ़ूल सा आकर खिला
निष्कपट, निःस्वार्थ, निश्छल
ह्रदय साथ उसको मिला.
कुछ पलों के बाद ही
ज़माने की हवा चलने लगी
गर्म उन थपेडों से
कोमल त्वचा जलने लगी.
बालक मन ने घबडा कर
कर लिया किनारा बचपन से
छल और कपट का साथ पकड
कर लिया सामना जीवन से.
अब फ़िर चमन उदास है
फ़िर एक बालक की आस है
यही जीवन का यर्थाथ है
यह हर चमन का इतिहास है.
–समीर लाल
जब जब भी वो आये
जब जब भी वो आये
एक अरसा किया इंतज़ार हमने
ना खत आया ना संदेशे आये.
वो जब कभी सपनों मे आये
सितम दर सितम बन के आये.
ख्वाबों मे भी एहसास इस कदर
वो दूरियों का लेकर आये.
नींद के उजाले मे भी
धुआं धुआं ही नज़र आये.
ऎसे मै जान लेता हूँ हरदम
कि यादों मे उनके ही थे साये.
जब आँसू आंख भिगा जाये
और नींद कहीं दूर सो जाये.
–समीर लाल
आफिस कुण्डलियाँ और दोहा: एक प्रयास
आफिस कुण्डलियाँ और दोहा मात्र एक प्रयास है, अनुभूति की साईट पर दिये सारे नियमों का पालन किया है. कुण्डलियाँ और दोहा पर काफ़ी विस्तार से समझाया गया है यहाँ देखें: http://www.anubhuti-hindi.org/kavyacharcha/Chhand.htm
मगर मेरे प्रयास को यहाँ देखें:
काम जरुरी ना करो, देर शाम को जाये
न माना पछतायेगा, हानि बहुत कराये.
हानि बहुत कराये कि जब सूरज ढल जाये.
भर लो रम का ज़ाम, साथ सोडा मिलवाये.
बीच बीच मे चुनगे फिर खाना तुम पान
सोकर उठो जब चैन से, तबहि करना काम.
॥२॥
आफिस मे बस कीजिये,उतना सा ही काम
नौकरी चलती रहे, शरीर करे आराम.
शरीर करे आराम जब भी मूड बना लो
कागज़ कलम निकाल और कविता लिख डालो.
कह समीर कविराय खेचो जेब से माचिस
सिगरेट लो जलाय भाड मे जाये आफिस.
आफिस दोहा
नौकरी वहां चाहिये, काम न हो अधिकाय.
मै बैठा कविता रचूँ,बौस समझ ना पाय.
कुछ बूंदें बारिश की:विवादित “वाटर” फिल्म
अभी विवादित “वाटर” फिल्म देखी, मन दुखी हो गया.दिल को मेरे रुला दिया और मै अब तक दुखी हूँ. दीपा जी से गुजारिश, नया भारत देखिये और दिखाईये. जो आप दिखायेंगी वही बाहरी दूनिया समझेगी…खैर, जो भी हो, इस बाबत कुछ पंक्तियाँ उतर आयीं कागज पर…..चुहिया को देख:
कुछ बूंदें बारिश की
छाजन से मैने
हाथ अपने बढा के
बारिश की बूंदो को
अंजूरी मे सजा के
क्या पाया है मैने
यूँ सपने जगा के
अपंग समाज है इसे
अपना बना के.
–समीर लाल
महाकवि Robert Frost भाग २: एक नज़रिया-अंधियारे उजियारे
फ़िर सुना और पढा, भईया की एक और कविता. वैसे तो ढेरों पढ चुका हूँ, मगर इसकी गहराई नापने मे पसीने छूट गये. जब जब पढा, एक नया अर्थ. फिर अपने अंदाज़ मे अर्थ लिखा और अब विडंबना यह कि अर्थ भी पदता हूँ तो हालाँकि खुद का लिखा है, फ़िर भी नया मतलब निकलता है. बहुत गज़ब बात है भईया की लेखनी मे, कोई तोड नही. कहाँ जंगल मे तफ़रीह ले रहे थे और कहाँ इतनी गहरी बात “Stopping by Woods on a Snowy Evening “.तो अब फ़िर सुनो, पहले फ़िर से अग्रज और तब मेरी समझ….अनुवाद नही, बस मेरा नज़रिया, भईया Robert की सोच पर….मैने नाम दिया “अंधियारे उजियारे”..कैसा लगा?…भईया भी शीर्षक देखें तो घबरा जायें…
तो पहले भईया:(श्रीमान Robert Frost जी):
Stopping by Woods on a Snowy Evening
Whose woods these are I think I know,
His house is in the village though.
He will not see me stopping here,
To watch his woods fill up with snow.
My little horse must think it queer,
To stop without a farmhouse near,
Between the woods and frozen lake,
The darkest evening of the year.
He gives his harness bells a shake,
To ask if there is some mistake.
The only other sound’s the sweep,
Of easy wind and downy flake.
The woods are lovely, dark and deep,
But I have promises to keep,
And miles to go before I sleep,
And miles to go before I sleep.
– Robert Frost
अब मुझे सुनिये…जब भईया को सुना, जो आपको समझ मे भी नही आई, तो मुझे क्यों नही…..
एक नज़रिया: अंधियारे उजियारे
भाग आया ज़िंदगी से
इस कदर परेशान था
हर तरफ़ घनघोर अंधेरा
जानकर हैरान था.
गमों के थे स्याह जंगल
आसूओं की झील थी
मै ही अपने साथ था
बस मौत ही तामील थी.
तब उठी झंकार मन से
आत्मा की आवाज है
क्या तू करता है रे पगले
ज़िदगी नायाब है.
पहचान तुझको खुद बनानी
होगी इस संसार मे
खुशीयाँ ही है हर तरफ़
बस देखने का अंदाज़ है.
ध्यान रख कि इस धरा को
तुझसे अनंत अरमान हैं
अंतिम पडाव के पहले
अभी बाकी बहुत मुकाम हैं
अंतिम पडाव के पहले
अभी बाकी बहुत मुकाम हैं………
–हिन्दी मे एक नज़रिया: समीर लाल
यह मात्र मेरा नज़रिया है इस कविता को देखने का. आपका क्या नज़रिया है इसका इंतजार रहेगा.
महाकवि Robert Frost: एक नज़रिया..अनजान राहें
Robert Frost हमेशा से मेरे अंग्रेजी के सबसे पसंदीदा कवि रहे है. उनकी कविताओं को जितनी बार पढता हूँ, एक अलग ही अर्थ पाता हूँ, ऎसा इसलिये नही कि अंग्रेजी मे मेरा हाथ बहुत ज्यादा तंग है या दिन पर दिन मेरी अंग्रेजी सुधर रही है.बस उनकी कविताऎं हैं ही इतनी गहरी कि पूर्ण थाह पाना सिर्फ़ तथाकथित विद्वानों के बस की बात है. मै जानता हूँ कुछ ऎसे विद्वानों को. खैर, उनको मेरा साधुवाद. अब फ़िर से रोर्बट बाबू की बात करें. जाने कहाँ कहाँ अकेले घूमते रहते थे और वो भी कलम ले कर. बिन बात की बात पर, बस कहीं भी किनारे बैठ गये और कविता दाग दी. अब आप हम भी तो कितने तिराहों से गुज़रे हैं, बल्कि रोज़ ही कहीं ना कहीं तिगड्डा ( ये जबलपुरीया वर्जन है तिराहे का) पडता है, कितनी बार शार्ट कट के चक्कर मे दूसरे वाले रोड से निकल गये…क्या कभी कविता लिखी इस पर..नहीं..क्या कभी इससे कोई जीवन मे अंतर आया, नहीं..ब्लकि कई बार वन वे वगैरह के चक्कर मे जरुर फ़सें. मगर, भईया(रोर्बट भाई) ने तो ऎसी सटीक कविता लिख डाली कि अच्छे अच्छे हिल गये..The Road Not Taken…जब सब हिले तो हम क्यों ना हिलें. अब हिलें तो पता भी तो लगे कि हिले..तो पेश है हमारा भईया की कविता का हिन्दी रुपांतरण. आशा है, आपको इसका भावनात्मक पहलू पसंद आयेगा. पहले आप रोर्बट भाई को पढें, फ़िर मुझे. भईया अग्रज हैं, हक बनता है.
The Road Not Taken
TWO roads diverged in a yellow wood,
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;
Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim,
Because it was grassy and wanted wear;
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,
And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black.
Oh, I kept the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way,
I doubted if I should ever come back.
I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I—
I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.
–Robert Frost
अब मेरी बारी, सुनना ही पडेगा:
अनजान राहें………
राह पकड मैं चल रहा था, मंज़िल थी बस ध्यान मे
देखा तब दॊ राह को बनते, उस पर्ण वन उद्यान मे.
एक मैं और सीमा मेरी है, दोनो पर कैसे चल पाऊँगा
किस पर चलूँ उलझन बस इतनी, मंज़िल किस पर पा पाऊँगा.
एक वो जो अल्लहड बाला सी, बना ना सकी कोई पहचान
दूसरी जिस पर थे अंकित, असंख्य कदमों के निशां.
मैने चुनी वो राह जिस पर, घाँस थी बस हरी हरी
शायद अब तक बहुत थोडे, जिसने इसकी थाह धरी.
सोचता था फ़िर कभी, यह दूसरी मै राह लूँगा
अंर्तमन मे जानता था, कहाँ कभी ये अंज़ाम दूँगा.
चल पडा बिन पद चिन्ह की, उस राह का दामन मै थाम
शायद वो ही फ़ैसला था, जिससे पाया अभिनव मुकाम.
–हिन्दी नज़रिया एवं रुपांतरण: समीर लाल
अपनी प्रतिक्रिया बतायें, तब तक मै मेरी दूसरी कविता जो फ़िर से भईया की सोच पर आधारित है, को तैयार करता हूँ.
तेरी बहुत याद आती है…..
हिन्दी नेस्ट कार्यशाला #१६ मे चयनित मेरी रचना:
यादें
जब भी उस तस्वीर की तरफ
मेरी नजर जाती है
मॉ
मुझको तेरी बहुत याद आती है
वो तेरी ऊँगली पकड कर के चलना
समुंदर की लहरों पर गिरना मचलना
वो तेरा मुझको अपनी बाहों मे भरना
माथे पे चुबंन का टीका वो जडना
जब भी हवा अपने संग
समुंदर की खुशबु लाती है
मॉ
मुझको तेरी बहुत याद आती है
वो मेरी चोट पर तेरा आसूँ बहाना
मेरी बात सुन कर तेरा खिलखिलाना
मेरी शरारतों पर वो झिडकी लगाना
फिर प्यारी सी लोरी गा कर सुलाना
जब भी रातों मे हवा
कोइ गीत गुनगुनाती है
मॉ
मुझको तेरी बहुत याद आती है
ऎसा क्यूँ हो जाता है……
ऎसा क्यूँ हो जाता है
जब रात चाँदनी आती हैं
दिल की धडकन बड जाती है
तेरी यादें बहुत सताती हैं.
ऎसा क्यूँ हो जाता है
जब कोयल कूह कूह गाती है
पैरों मे थिरकन होती है
तेरे गीत हवा सुनाती है
ऎसा क्यूँ हो जाता है
जब हवा चमन महकाती है
आँखॊं मे आँसूं होते हैं
तेरे बदन की खुशबू आती है.
ऎसा क्यूँ हो जाता है
जब मॊसम मे बदली छाती है
दिन मे अंधियारा होता है
जगे स्वपन तेरे दिखलाती है.
सुना है आज होली है
सुना है आज होली है
हम बेवतन-
आज फ़िर आँख अपनी हमने
आंसुओं से धो ली है.
हर तरफ़ बस रंग होंगे
साथी सारे संग होंगे
गुलाल और अबीर माथे पे मल
नाच गानों मे मगन होंगे.
सुना है आज होली है
हम बेवतन-
आज फ़िर आँख अपनी हमने
आंसुओं से धो ली है.
बच्चों की टोली मे हूड़दंग होंगे
अभिवादन मिठाईयों के संग होंगे
पिचकारियों की बौछारों से
भीगे सारे चमन होंगे.
सुना है आज होली है
हम बेवतन-
आज फ़िर आँख अपनी हमने
आंसुओं से धो ली है.
